परिषदीय प्राथमिक, उच्च प्राथमिक और कंपोजिट स्कूलों में बच्चों की सुविधा के लिए आने वाले धन की बंदरबांट किस कदर होती है इसका अंदाजा जिले के स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की स्थिति देखकर लगाया जा सकता है। शौचालय सफाई से लेकर टोटी की मरम्मत और रंगाई पुताई के नाम पर सरकार हर साल जिले में करीब आठ करोड़ रुपये कंपोजिट ग्रांट देती है, लेकिन सुविधा नहीं तो आखिर वह बजट कहां खर्च हुआ इसका कोई पता करने वाला नहीं है।जिले में 2807 परिषदीय प्राथमिक, उच्च प्राथमिक एवं कंपोजिट स्कूल संचालित हो रहे हैं। विभागीय आंकड़ों की मानें तो छात्र संख्या के आधार पर 25 हजार से लेकर 75 हजार रुपये तक हर स्कूल को कंपोजिट ग्रांट दिया जाता है।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!यानी यह राशि करीब आठ करोड़ से अधिक होती है। स्कूलों में गठित एसएमसी के खाते में जाने वाली यह धनराशि कहां खर्च हो रही है यदि इसकी ठीक से निगरानी हो तो स्कूलों की बुनियादी सुविधाएं मुकम्मल की जा सकती हैं। ब्लॉक स्तर पर खंड शिक्षा अधिकारियों को इसकी निगरानी के लिए जिम्मेदारी दी गई है लेकिन जिले स्तर पर कोई निगरानी तंत्र नहीं है। यानी ब्लॉक स्तर के अधिकारी यदि मनमानी करें तो कोई यह भी नहीं पूछने वाला है कि आखिर ऐसा कैसे हुआ। शायद यहीं वजह है कि कितने स्कूलों में सुविधाओं का अभाव है यह किसी को पता नहीं है।

