रिपोर्ट: स्टेट हेड प्रियांशु मिश्रा
फतेहपुर, बाराबंकी। तहसील फतेहपुर क्षेत्र में इन दिनों एक कथित मिट्टी खनन का मामला चर्चा का विषय बना हुआ है। मामला श्री सांई हॉस्पिटल से जुड़ा बताया जा रहा है, जिसका संचालन क्षेत्र के चर्चित चिकित्सक डॉ. एस.एस. जीत सिंह द्वारा किया जाता है। आरोप है कि अस्पताल प्रबंधन से जुड़ी निजी भूमि पर कई फीट गहराई तक खुदाई कर मिट्टी निकाली जा रही है और इसे भूमि समतलीकरण का कार्य बताकर प्रशासनिक अनुमति का हवाला दिया जा रहा है। हालांकि मौके से जुटाए गए साक्ष्य और स्थानीय स्तर पर की गई पड़ताल कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है।
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इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पत्रकारों के पास ऐसे वीडियो और फोटोग्राफ मौजूद हैं जिनमें मिट्टी को केवल खुदाई स्थल के सामने डंप नहीं किया जा रहा, बल्कि ट्रैक्टर-ट्रॉलियों के माध्यम से दूसरे स्थानों तक ले जाया जाता हुआ स्पष्ट दिखाई दे रहा है। यही नहीं, स्थानीय लोगों और काम कर रहे मजदूरों तथा ठेकेदार से हुई बातचीत भी कई नए सवाल पैदा करती है।
जमीन समतलीकरण या व्यावसायिक मिट्टी बिक्री?
आमतौर पर जब किसी निजी भूमि पर समतलीकरण अथवा निर्माण कार्य के लिए खुदाई की अनुमति ली जाती है, तो निकाली गई मिट्टी का उपयोग उसी परिसर में किया जाता है या नियमानुसार उसका निस्तारण किया जाता है। लेकिन इस मामले में पत्रकारों द्वारा कई दिनों तक की गई निगरानी के दौरान जो तस्वीरें और वीडियो सामने आए हैं, वे अलग कहानी बयान करते हैं।

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार खुदाई स्थल से लगातार ट्रैक्टर-ट्रॉलियां मिट्टी भरकर निकलती रहीं और उन्हें दूसरे स्थानों तक पहुंचाया जाता रहा। पत्रकारों द्वारा बनाई गई वीडियो रिकॉर्डिंग में भी मिट्टी लदी ट्रॉलियां क्षेत्र के विभिन्न मार्गों से गुजरती दिखाई दे रही हैं।
जब मौके पर कार्य कर रहे लोगों से बातचीत की गई तो जानकारी मिली कि मिट्टी केवल सामने डंप नहीं की जा रही है, बल्कि मिरदहन पुरवा क्षेत्र में स्थित एक निजी प्लॉट तक पहुंचाई जा रही है। यदि यह दावा सही पाया जाता है तो मामला केवल भूमि समतलीकरण का न रहकर खनिज संपदा के व्यावसायिक उपयोग और बिक्री से जुड़ा माना जा सकता है।

मिरदहन पुरवा तक पहुंच रही मिट्टी
स्थानीय सूत्रों का कहना है कि खुदाई स्थल से निकाली गई मिट्टी मिरदहन पुरवा में स्थित एक निजी भूखंड पर डाली जा रही है। पत्रकारों द्वारा की गई पड़ताल में मिट्टी लेकर जाती हुई कई ट्रॉलियों की तस्वीरें और वीडियो दर्ज किए गए हैं।
सूत्रों का दावा है कि यह प्रक्रिया एक-दो दिन की नहीं बल्कि लगातार चल रही गतिविधि है। यदि किसी व्यक्ति को मिट्टी बेची जा रही है या उसके प्लॉट पर भुगतान लेकर डाली जा रही है, तो यह जांच का गंभीर विषय है कि इस प्रक्रिया में खनन विभाग, राजस्व विभाग तथा प्रशासनिक नियमों का पालन किया गया या नहीं।
तहसील रिकॉर्ड में नहीं मिली अनुमति?
मामले की पड़ताल के दौरान पत्रकारों ने तहसील स्तर पर उपलब्ध अभिलेखों की भी जानकारी जुटाई। आरोप है कि डॉ. शिशु समर राज सिंह अथवा संबंधित नाम से तहसील में ऐसी कोई स्पष्ट अनुमति उपलब्ध नहीं मिली, जिसके आधार पर इतनी बड़ी मात्रा में मिट्टी का खनन और परिवहन किया जा सके।
हालांकि इस संबंध में प्रशासनिक स्तर पर आधिकारिक पुष्टि अभी होना बाकी है, लेकिन यदि वास्तव में वैध अनुमति उपलब्ध नहीं है तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर कई फीट गहरी खुदाई किस आधार पर की जा रही है।
कानूनी जानकारों का कहना है कि सामान्य भूमि समतलीकरण और व्यावसायिक उद्देश्य से मिट्टी निकालने में स्पष्ट अंतर होता है। यदि मिट्टी को अन्यत्र ले जाकर उपयोग या बिक्री की जाती है तो कई मामलों में खनन नियमों और राजस्व संबंधी प्रावधान लागू हो सकते हैं।
प्रशासनिक चुप्पी पर सवाल
स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि मामले की जानकारी संबंधित अधिकारियों तक पहुंचने के बावजूद अभी तक कोई प्रभावी कार्रवाई दिखाई नहीं दे रही है। क्षेत्रीय लोगों का कहना है कि यदि यही कार्य कोई सामान्य किसान या गरीब व्यक्ति करता तो संभवतः प्रशासनिक कार्रवाई तत्काल देखने को मिलती।
ग्रामीणों के बीच यह चर्चा भी है कि दिन-दहाड़े ट्रैक्टर-ट्रॉलियों से मिट्टी का परिवहन हो रहा है, लेकिन जिम्मेदार विभागों की ओर से कोई ठोस जांच नहीं की गई। इससे प्रशासनिक निष्क्रियता को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
पत्रकारों के पास क्या हैं साक्ष्य?
इस मामले को लेकर सबसे अहम पहलू उपलब्ध साक्ष्य हैं। पत्रकारों के पास—
– खुदाई स्थल के फोटो।
– गहरे गड्ढों की तस्वीरें।
– मिट्टी लदी ट्रैक्टर-ट्रॉलियों के वीडियो।
– मिट्टी परिवहन के दृश्य।
– कथित डंपिंग स्थल की तस्वीरें।
– मौके पर मौजूद लोगों से हुई बातचीत के रिकॉर्ड।
इन साक्ष्यों से प्रथम दृष्टया यह संकेत मिलता है कि निकाली गई मिट्टी केवल स्थल के आसपास नहीं रखी जा रही बल्कि अन्यत्र भेजी जा रही है। यही बिंदु पूरे मामले को सामान्य भूमि समतलीकरण से अलग बनाता है।
राजस्व को हो सकता है नुकसान
खनन विशेषज्ञों के अनुसार यदि किसी क्षेत्र से बड़े पैमाने पर मिट्टी निकाली जाती है और उसका व्यावसायिक उपयोग किया जाता है, तो निर्धारित शुल्क और रॉयल्टी का भुगतान आवश्यक हो सकता है। ऐसे मामलों में प्राप्त राजस्व सरकारी खजाने में जमा होना चाहिए।
यदि जांच में यह सिद्ध होता है कि मिट्टी का परिवहन और बिक्री बिना वैध अनुमति या बिना राजस्व जमा किए की गई है, तो यह सरकारी राजस्व को संभावित नुकसान पहुंचाने का मामला भी बन सकता है।
यही कारण है कि स्थानीय नागरिक मांग कर रहे हैं कि पूरे प्रकरण की तकनीकी जांच कराई जाए और यह पता लगाया जाए कि कुल कितनी मिट्टी निकाली गई, उसका उपयोग कहां हुआ और क्या उसके बदले नियमानुसार राजस्व जमा कराया गया।
पर्यावरणीय प्रभाव भी चिंता का विषय
विशेषज्ञों का मानना है कि अनियंत्रित खुदाई केवल राजस्व का मामला नहीं होती बल्कि पर्यावरणीय संतुलन को भी प्रभावित कर सकती है। कई फीट गहरी खुदाई भविष्य में जलभराव, दुर्घटना और भूमि की संरचना पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है।
यदि किसी भूखंड पर आवश्यकता से अधिक खुदाई की गई है तो संबंधित विभागों को उसकी भी जांच करनी चाहिए।
निष्पक्ष जांच की मांग
स्थानीय नागरिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और क्षेत्र के जागरूक लोगों ने मांग की है कि मामले की जांच राजस्व विभाग, खनन विभाग और प्रशासन की संयुक्त टीम द्वारा कराई जाए।
लोगों का कहना है कि जांच के दौरान निम्न बिंदुओं की पुष्टि की जाए—
1. खुदाई की वास्तविक गहराई कितनी है?
2. अनुमति ली गई थी या नहीं?
3. यदि अनुमति थी तो उसकी शर्तें क्या थीं?
4. निकाली गई मिट्टी का उपयोग कहां किया गया?
5. मिट्टी का परिवहन किस आधार पर किया गया?
6. क्या राजस्व और रॉयल्टी जमा की गई?
7. मिरदहन पुरवा में मिट्टी पहुंचाने के आरोप कितने सही हैं?
प्रशासन के सामने बड़ी परीक्षा
यह मामला अब केवल मिट्टी खनन तक सीमित नहीं रह गया है बल्कि प्रशासन की कार्यशैली पर भी सवाल खड़े कर रहा है। क्षेत्र के लोगों का मानना है कि यदि उपलब्ध वीडियो और फोटो साक्ष्यों के बावजूद जांच नहीं होती, तो इससे आम जनता का भरोसा प्रभावित होगा।
अब निगाहें उपजिलाधिकारी, तहसील प्रशासन और खनन विभाग पर टिकी हैं। जनता जानना चाहती है कि आखिर सच्चाई क्या है—क्या यह केवल भूमि समतलीकरण का मामला है या फिर मिट्टी खनन और बिक्री का कोई बड़ा खेल?
जब तक सक्षम जांच एजेंसियां पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच नहीं करतीं, तब तक यह मामला क्षेत्र में चर्चा और विवाद का विषय बना रहेगा। पत्रकारों के पास मौजूद वीडियो और फोटोग्राफ अब प्रशासनिक कार्रवाई की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
(यदि संबंधित पक्ष अपना पक्ष रखना चाहता है तो उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा। निष्पक्ष पत्रकारिता के सिद्धांतों के तहत सभी पक्षों का मत महत्वपूर्ण है।)

