अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी का मामला अब एक नए मोड़ पर पहुंच गया है। जिस मंदिर में करोड़ों श्रद्धालु अपनी आस्था और श्रद्धा के साथ चढ़ावा अर्पित करते हैं, वहीं चढ़ावे की रकम में कथित गड़बड़ी को लेकर उठे सवालों पर अब सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। सोमवार को शीर्ष अदालत ने इस मामले से जुड़ी याचिकाओं का निपटारा करते हुए आगे की कार्रवाई निचली अदालत में कानून के अनुसार चलाने का निर्देश दिया है। लेकिन इस फैसले के साथ ही अदालत ने एक ऐसा रास्ता भी खोल दिया है, जिससे याचिकाकर्ता आगे की न्यायिक प्रक्रिया में अपनी भूमिका निभा सकेंगे।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!दरअसल, अयोध्या स्थित श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में श्रद्धालुओं की ओर से चढ़ाई जाने वाली नकदी और अन्य भेंटों के प्रबंधन में कथित अनियमितताओं को लेकर कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई थीं। याचिकाकर्ताओं ने इस मामले की स्वतंत्र और अदालत की निगरानी में जांच कराने की मांग की थी। इसके साथ ही जांच में पारदर्शिता और मंदिर में प्राप्त चढ़ावे के हिसाब-किताब का विस्तृत परीक्षण कराने की मांग भी उठाई गई थी। मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पहले विशेष जांच दल यानी एसआईटी के माध्यम से जांच कराने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया था।
सोमवार को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ के सामने उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से बताया गया कि विशेष जांच दल अपनी जांच पूरी कर चुका है और मामले में आरोपपत्र दाखिल किया जा चुका है। सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि कथित गड़बड़ी मुख्य रूप से मंदिर परिसर में चढ़ावे की नकदी की गिनती के दौरान हुई थी। जांच में उन लोगों की भूमिका सामने आई है, जो नकदी की गिनती के काम में शामिल थे।
सरकार की ओर से यह भी बताया गया कि जांच एजेंसियों ने संबंधित लोगों के बैंक खातों, पुराने वित्तीय लेनदेन और संपत्तियों से जुड़े दस्तावेजों की पड़ताल की है। जांच के दौरान कुछ रकम बैंक खातों में जमा होने और कुछ धनराशि से संपत्ति खरीदे जाने की जानकारी भी सामने आने की बात अदालत को बताई गई। एसआईटी की जांच में चढ़ावे की नकदी को अनधिकृत रूप से हटाने या छिपाने की 105 घटनाओं का पता चलने की जानकारी भी सामने आई है। इस मामले में कुल आठ लोगों को आरोपित किया गया है।
उत्तर प्रदेश सरकार ने अदालत को बताया कि अयोध्या की संबंधित अदालत में आठों आरोपितों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया जा चुका है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले से जुड़ी याचिकाओं का निपटारा करते हुए संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट को निर्देश दिया कि वह कानून के मुताबिक आगे की कार्यवाही करें। हालांकि अदालत ने याचिकाकर्ताओं को भी राहत देते हुए उन्हें मुकदमे की सुनवाई के दौरान आवश्यकता पड़ने पर न्यायिक मजिस्ट्रेट की सहायता करने की अनुमति दी है। अदालत का मानना है कि इस मामले में जनहित का पहलू भी जुड़ा हुआ है।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिकाओं का निपटारा करने का अर्थ यह नहीं है कि अदालत ने आरोपों की सच्चाई या आरोपितों के दोषी होने पर कोई राय दे दी है। पीठ ने साफ कहा कि मामले के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं की गई है और निचली अदालत को कानून के अनुसार स्वतंत्र रूप से कार्यवाही करनी होगी। यानी अब आरोपों की अंतिम सच्चाई और आरोपितों की जिम्मेदारी का फैसला संबंधित निचली अदालत में होने वाली न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर किया जाएगा।
सरकार की ओर से अदालत को यह जानकारी भी दी गई कि मंदिर में चढ़ाई गई अन्य मूल्यवान भेंटों और धार्मिक वस्तुओं का परीक्षण किया गया है तथा वे सुरक्षित पाई गई हैं। इसके अलावा भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए आवश्यक व्यवस्थाएं किए जाने की बात भी कही गई। मुख्य न्यायाधीश ने भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के उपायों को लेकर चिंता जताई और अधिकारियों से व्यवस्था मजबूत करने पर जोर दिया।
अब इस पूरे मामले की आगे की सुनवाई अयोध्या की संबंधित अदालत में होगी। सुप्रीम कोर्ट में याचिकाओं का निपटारा हो चुका है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आपराधिक मामला समाप्त हो गया है। अब निचली अदालत में आरोपपत्र, साक्ष्यों और अन्य तथ्यों के आधार पर कानूनी कार्यवाही आगे बढ़ेगी। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि मंदिर के चढ़ावे से जुड़ी कथित गड़बड़ियों के मामले में अदालत में कौन-कौन से तथ्य सामने आते हैं और न्यायिक प्रक्रिया के बाद क्या निष्कर्ष निकलता है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद मामले की अगली दिशा अयोध्या की निचली अदालत तय करेगी।

